(जल्वए आला हज़रत13)
➲ सबबे तालीफ़ : नबीर - ए - आला हजरत शहजाद - ए - रेहाने मिल्लत हजरत अल्हाज कारी मुहम्मद तस्लीम रजा खाँ साहब नूरी मद्दा जिल्लहुल - आली से एक मुलाकात के मौका पर मेरी बाज़ तालीफात मसलन “ इमाम अहमद रज़ा और इल्मे हदीस ( पाँच जिल्द ) सीरते मुस्तफा जाने रहमत , ( चार जिल्द ) फरमूदाते आला हजरत और उलूमुल - कुरआन वगैरह का जिक्र हुआ तो उ न्होंने उन्हें खूब सराहा और दुआयें दीं। नीज़ फरमाया कि “ फैजाने आला हज़रत " के नाम से एक किताब की ज़रूरत महसूस की जा रही है अगर आप उसे मुरत्तब करें तो बहुत बेहतर होगा आप उसकी तबाअत व इशाअत की फिक्र न करें मैं इसे " इमाम अहमद रजा लाइब्रेरी " की तरफ से छपवा दूंगा। उनके हुक्म पर मैंने अस्बात में जवाब तो दे दिया मगर कम माइगी और बेबज़ाअती का एहसास बशिद्दत दामनगीर हुआ और मैं सोचता रहा कि निशाने मंजिल के बगैर अज्मे सफर कैसे करूँ। बात तो समझ में आ गई थी कि " फैजाने आला हज़रत के नाम से किताब की वाकई ज़रूरत है जो मसाजिद व मजालिस वगैरह में अवामुन्नास को पढ़ कर सुनाया जा सके और जिसमें मसलके आला हज़रत के मुताबिक अकाइद व ईमानियात और मरासिम अहले सुन्नत वगैरह का जामेअ ब्यान हो!
➲ मैं इसी गौर व फिक्र में मुस्तगरक व महव था कि शहज़ाद - ए - रेहाने मिल्लत कारी मुहम्मद तस्लीम रज़ा खाँ साहब नूरी से फिर दोबारा फोन पर बात हुई तो आपने मजीद ताकीद के साथ फरमाया कि आप जरूर फैजाने आला हज़रत ' की तरतीब शुरू कर दें और यह कि इस बात का भर पूर ख्याल रखा [ जाए कि इसके तमाम मज़ामीन व मवाद तसानीफ आला हज़रत ही से माखूज व मुस्तखरज हों क्योंकि मेरे रज़ा ने अपनी तसानीफे आलिया में कुछ भी नहीं छोड़ा सब कुछ ब्यान फरमा दिया है , उनकी तसानीफ में दुनिया - ए - इल्म य तहकीक के कीमती व अनमोल खजाने मौजूद हैं बस उन है। गौहर हाए आबदार निकालने की जरूरत है अगर ऐसा हो गया तो उन से दुनिया की आँखें चौंध और खीरा हो जाएँगी और दुनिया पुकार उठेगी कि वाकई इमाम अहमद रज़ा बरेलवी अपना जात व सिफात में एक जहाने हैरत और इल्म व फन की आमाजगाह हैं!(बा-हवाला, फैज़ाने आला हजरत सफ़ह-54)
मौलाना अब्दुल लतीफ नईमी रज़वी क़ादरी
बड़ा रहुवा बायसी पूर्णियाँ (सीमांचल)